आज का पंचांग
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मुहूर्त और समय
काशी/IST · खगोलीय गणना- संकल्प (सूर्योदय)06:18
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होली का महत्व
होली लगातार दो दिनों के दो पर्व हैं। फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को होलिका दहन होता है — प्रदोष काल में, भद्रा बीत जाने पर प्रज्वलित की गई अग्नि, जिसमें बीते वर्ष का संचय जलता है। अगला प्रातः रंगवाली होली है, रंगों का उत्सव।
अग्नि प्रह्लाद का स्मरण है, जिसकी भक्ति उसमें भी जीवित रही। रंग श्रीकृष्ण का स्मरण है, जिन्होंने यशोदा से शिकायत की कि राधा गोरी हैं और वे श्याम, और उत्तर मिला कि जाओ, उनका मुख जिस रंग में चाहो रंग दो। जो बालक की शिकायत से आरंभ हुआ वह वही एक दिन बन गया जब दूरी, पद और मर्यादा के सामान्य नियम स्थगित रहते हैं।
होलिका दहन भद्रा काल में नहीं करना चाहिए, और पूर्णिमा के आरंभ से पूर्व तो कदापि नहीं। जहाँ भद्रा सम्पूर्ण प्रदोष काल घेर ले, वहाँ दहन उसके पश्चात रात्रि में किया जाता है।
होली पूजा विधि
- 1कुछ दिन पूर्व चुने हुए स्थान पर लकड़ी और उपले एकत्र कर होलिका सजाएँ।
- 2उसके मध्य उपलों से बनी होलिका की प्रतिमा रखें, जिसकी गोद में प्रह्लाद हों।
- 3प्रदोष काल में, भद्रा समाप्त होने पर, जल, रोली, अक्षत, पुष्प, हल्दी, गुलाल अर्पित करें और कच्चा सूत होलिका के चारों ओर लपेटें।
- 4अग्नि प्रज्वलित करें और तीन, पाँच अथवा सात परिक्रमा करें, अन्न और नारियल अर्पित करते हुए।
- 5नई जौ और चना अग्नि में भूनकर प्रसाद रूप में ग्रहण करें; कुछ भस्म घर ले जाएँ।
- 6अगले प्रातः भस्म मस्तक पर लगाएँ, फिर गुलाल से आरंभ करें — पहले सूखा रंग, बड़ों के चरणों पर।
- 7मिलें, क्षमा करें, और जो अनसुलझा रह गया उसे सुलझाएँ। यह दिन पुराने कलह समाप्त करने का है, बढ़ाने का नहीं।
मंत्र
ॐ ह्रीं होलिकायै नमः
Om Hreem Holikayai Namah
दहन के समय जपा जाता है, जब जो बीत चुका उसे अग्नि को सौंपा जाता है।
व्रत के नियम
- कोई उपवास विहित नहीं। व्रत का स्वरूप है प्रथम संध्या का दहन और द्वितीय प्रातः का रंग।
- होलिका दहन प्रदोष काल में, भद्रा की समाप्ति और पूर्णिमा के आरंभ के पश्चात ही करें।
- अग्नि की विषम संख्या में परिक्रमा करें — तीन, पाँच अथवा सात — और अन्न अर्पित करें।
- नई फसल का अन्न, विशेषतः जौ और चना, अग्नि में भूनकर प्रसाद रूप में खाया जाता है।
- अगले प्रातः रंग आरंभ होने से पूर्व होलिका की भस्म मस्तक पर लगाई जाती है।
सामान्य भूलें — किनसे बचें
- कृत्रिम रासायनिक रंगों का प्रयोग — ये त्वचा और नेत्रों को हानि पहुँचाते हैं; हर्बल या टेसू-फूल के रंग पुरानी, सुरक्षित रीति हैं।
- जो खेलना न चाहें उन लोगों, बच्चों या पशुओं पर रंग थोपना — 'बुरा न मानो' निमंत्रण है, बाध्यता नहीं।
- अत्यधिक जल व्यर्थ करना; परंपरागत होली अधिकतर सूखे गुलाल की है।
- बिना सावधानी या सहमति ठंडाई में भांग मिलाना, और उन्हें देना जिन्हें नहीं लेनी चाहिए।
- अंडे, ग्रीस या कीचड़ से कठोर खेल, जो सद्भाव का पर्व हानि में बदल देता है।
होली की व्रत कथा
हिरण्यकशिपु को ऐसा वरदान था कि वह लगभग अवध्य हो गया, और उसने माँग की कि उसे ईश्वर मानकर पूजा जाए। उसका अपना पुत्र प्रह्लाद न माना और विष्णु का नाम जपता रहा। पिता ने विष, गज और सर्प आज़माए, किंतु बालक जीवित रहा। अंततः उसने अपनी बहन होलिका को बुलाया, जिसके पास ऐसी चादर थी जिसे अग्नि न जला सकती थी, और कहा कि बालक को गोद में लेकर चिता में बैठे।
चादर उसके कंधों से उठकर प्रह्लाद पर जा पड़ी। होलिका जल गई; बालक निकल आया। जो वरदान उसे मिला था उसकी एक शर्त वह भूल गई थी — वह तभी फलता जब वह अग्नि में अकेली प्रवेश करे। वही रात्रि दहन है। कथा में जो जलता है वह कोई स्त्री नहीं, अपितु यह विश्वास है कि अपने लिए मिला कवच दूसरे के विरुद्ध प्रयोग करने पर भी टिकेगा।
होली — समय-रेखा
- पूर्णिमा संध्या — होलिका दहन
प्रदोष मुहूर्त में अग्नि जलाई जाती है, होलिका और वर्ष की बुराई जलाते; ज्वाला में नया अन्न भुना जाता है।
- अगला प्रातः — रंग आरंभ
रंगवाली होली (धुलेटी): सूखा गुलाल और रंगीन जल खेला जाता है, द्वार सबके लिए खुलते, भेद मिट जाते।
- मध्याह्न
खेल चरम पर; ठंडाई, गुझिया और मिष्ठान्न बाँटे जाते, गलियाँ संगीत-नृत्य से भर जातीं।
- संध्या — स्वच्छता एवं मिलन
लोग स्नान कर नए वस्त्र पहन बड़ों और पड़ोसियों से मिलने जाते, गले लगकर मिठाई बदलते।
प्रसिद्ध स्थान एवं मंदिर
बरसाना एवं नंदगाँव (ब्रज)
प्रसिद्ध लठमार होली, जहाँ बरसाना की स्त्रियाँ नंदगाँव के पुरुषों को हँसी-खेल में लाठियों से खदेड़ती हैं, शेष भारत से दिन पहले।
वृंदावन एवं मथुरा
कृष्ण की अपनी भूमि — बांके बिहारी की फूलों-वाली होली, और गोपीनाथ मंदिर की मार्मिक विधवा होली जो एक पुरानी वर्जना तोड़ती है।
शांतिनिकेतन, बंगाल
बसंत उत्सव, वह वसंत-पर्व जो टैगोर ने गढ़ा — पीले वस्त्रों में विद्यार्थी, गीले रंग के बजाय गीत-नृत्य।
आनंदपुर साहिब, पंजाब
होला मोहल्ला, होली के साथ का सिख वीर-पर्व, निहंगों के अश्वारोहण और शस्त्र-प्रदर्शन सहित।
रोचक तथ्य
- ◆ब्रज में होली लगभग सोलह दिन चलती है — बरसाना में शेष स्थानों की एक-दिवसीय होली से बहुत पहले आरंभ।
- ◆वृंदावन की विधवाएँ अब गोपीनाथ मंदिर में होली खेलती हैं, सदियों पुरानी सामाजिक वर्जना पलटती हुईं।
- ◆आनंदपुर साहिब का होला मोहल्ला ऋतु को शस्त्र-प्रदर्शन के सिख पर्व में बदलता है, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा आरंभ।
- ◆टैगोर ने होली को शांतिनिकेतन में बसंत उत्सव रूप में पुनर्कल्पित किया — गीले रंग के बजाय गीत का सुरुचिपूर्ण पर्व।
- ◆परंपरागत रंग प्रकृति से आते थे — टेसू (पलाश) पुष्प, हल्दी, चुकंदर और नीम।
सामान्य प्रश्न
होलिका दहन में भद्रा से क्यों बचा जाता है?
भद्रा (विष्टि करण) शुभ अग्नि-कर्मों को दूषित करने वाली मानी जाती है। दहन प्रदोष काल में तभी होता है जब भद्रा बीत चुकी हो; यदि भद्रा सम्पूर्ण संध्या घेरे, तो दहन रात्रि में किया जाता है।
होली एक दिन की है या दो?
दो दिन। होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को; रंगवाली होली अगले प्रातः, चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को।
होलिका की भस्म का क्या किया जाता है?
अगले प्रातः रंग आरंभ होने से पूर्व वह मस्तक पर लगाई जाती है, इस भाव से कि जो बीत गया वह अग्नि को समर्पित हो चुका।
पर्व-दिन शास्त्रीय नियमों से निर्धारित हैं — उदया, प्रदोष, निशिता, मध्याह्न या अपराह्न व्यापिनी, जैसा प्रत्येक पर्व का विधान है — काशी/वाराणसी (IST) हेतु गणना। कुछ वर्षों में क्षेत्रीय पालन एक दिन आगे-पीछे हो सकता है।
2026 के अन्य प्रमुख पर्व
- मकर संक्रांति — 14 जनवरी 2026
- वसंत पंचमी — 23 जनवरी 2026
- महाशिवरात्रि — 15 फ़रवरी 2026
- होलिका दहन — 3 मार्च 2026
- चैत्र नवरात्रि प्रारंभ — 19 मार्च 2026
- राम नवमी — 26 मार्च 2026
- अक्षय तृतीया — 19 अप्रैल 2026
- जगन्नाथ रथ यात्रा — 16 जुलाई 2026
- गुरु पूर्णिमा — 29 जुलाई 2026
- नाग पंचमी — 17 अगस्त 2026
- रक्षा बंधन — 28 अगस्त 2026
- कृष्ण जन्माष्टमी — 4 सितंबर 2026
- हरतालिका तीज — 14 सितंबर 2026
- गणेश चतुर्थी — 14 सितंबर 2026
- अनंत चतुर्दशी — 25 सितंबर 2026
- पितृ पक्ष प्रारंभ — 27 सितंबर 2026
- शारदीय नवरात्रि प्रारंभ — 11 अक्टूबर 2026
- दुर्गा अष्टमी — 19 अक्टूबर 2026
- महानवमी — 20 अक्टूबर 2026
- दशहरा / विजयादशमी — 20 अक्टूबर 2026
- करवा चौथ — 29 अक्टूबर 2026
- धनतेरस — 6 नवंबर 2026
- नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) — 8 नवंबर 2026
- दीपावली (लक्ष्मी पूजा) — 8 नवंबर 2026
- गोवर्धन पूजा — 10 नवंबर 2026
- भाई दूज — 11 नवंबर 2026
- छठ पूजा — 15 नवंबर 2026
- कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) — 24 नवंबर 2026
- गुरु नानक जयंती — 24 नवंबर 2026
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