भाद्रपद मास · भगवान गणेश एवं कृष्ण

भाद्रपद 1944 आरंभ व समाप्ति तिथि (भाद्रपद मास)

उत्तर भारत (पूर्णिमांत): शनिवार, 5 अगस्त 1944शनिवार, 2 सितंबर 1944

अमांत क्षेत्र: शनिवार, 19 अगस्त 1944रविवार, 17 सितंबर 1944

गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी, हरतालिका तीज और पितृ पक्ष का पर्व-बहुल मास।

भाद्रपद 2026 देखें — इस वर्ष

भाद्रपद 1944 एक नज़र में

उत्तर भारत · पूर्णिमांत
शनिवार, 5 अगस्त 1944
से शनिवार, 2 सितंबर 1944 · 29 दिन
पूर्णिमा पर समाप्त होने वाला मास
अमांत क्षेत्र
शनिवार, 19 अगस्त 1944
से रविवार, 17 सितंबर 1944 · 30 दिन
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु
उत्तर भारत · पूर्णिमांत
भाद्रपद शिवरात्रि
गुरु, 17 अग॰
पूर्णिमा
शनि, 2 सित॰
अमावस्या
शुक्र, 18 अग॰
अमांत क्षेत्र
भाद्रपद शिवरात्रि
शनि, 16 सित॰
पूर्णिमा
शनि, 2 सित॰
अमावस्या
रवि, 17 सित॰
तिथियाँ भिन्न क्यों? पूर्णिमांत पंचांग में मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है, अमांत में अमावस्या पर। इस कारण उत्तर भारत में भाद्रपद अमांत क्षेत्रों से लगभग 15 दिन पहले आरंभ होता है — यद्यपि पर्व एक ही दिन पड़ते हैं, क्योंकि वे तिथि पर आधारित हैं।

भाद्रपद का महत्व — भगवान गणेश एवं कृष्ण

भाद्रपद, वर्षा के अंत में, वर्ष के कुछ सबसे बड़े अनुष्ठान धारण करता है — जन्माष्टमी पर कृष्ण का जन्म, गणेश चतुर्थी पर गणेश की स्थापना, और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होने वाले दस दिन। इसका दूसरा, कृष्ण पक्ष पितृ पक्ष है, जो तर्पण और श्राद्ध द्वारा पूर्णतः पितरों को समर्पित है।

भाद्रपद के अनुष्ठान

  • गणेश स्थापना और अनंत चतुर्दशी तक दस दिन की आरती
  • जन्माष्टमी का निशीथ व्रत और अभिषेक
  • हरतालिका तीज — निर्जला शिव-पार्वती व्रत
  • पितृ पक्ष भर पितरों हेतु तर्पण और श्राद्ध
  • हरतालिका और ऋषि पंचमी व्रत
  • अनंत चतुर्दशी और अनंत सूत्र बाँधना

भाद्रपद 1944 के प्रमुख दिन

व्रत और तिथियाँ उसी मास-अवधि से निकाली जाती हैं जिसका आप पंचांग मानते हैं — इसलिए दोनों पद्धतियाँ अलग-अलग दी गई हैं।

भाद्रपद 1944 के पर्व

पूर्णिमांत मास-अवधि (शनि, 5 अग॰ – शनि, 2 सित॰) के भीतर। पर्व तिथि से तय होते हैं, इसलिए दोनों पद्धतियों में एक ही दिन पड़ते हैं।

अमांत भाद्रपद में अतिरिक्त (शनि, 19 अग॰ – रवि, 17 सित॰)

मासिक व्रत 1944

भाद्रपद 1944 — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भाद्रपद मास 1944 कब से शुरू है?

उत्तर भारत (पूर्णिमांत पंचांग) में भाद्रपद शनिवार, 5 अगस्त 1944 से शनिवार, 2 सितंबर 1944 तक रहता है। अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में यह शनिवार, 19 अगस्त 1944 से रविवार, 17 सितंबर 1944 तक रहता है।

उत्तर और दक्षिण भारत में भाद्रपद की तिथियाँ अलग क्यों हैं?

क्योंकि दोनों भिन्न चंद्र पंचांग का पालन करते हैं। पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) में मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है, अतः यह अमांत की तुलना में लगभग 15 दिन पहले आरंभ होता है। अमांत पंचांग (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु) में मास अमावस्या से अमावस्या तक चलता है।

भाद्रपद 1944 किसे समर्पित है?

भाद्रपद, वर्षा के अंत में, वर्ष के कुछ सबसे बड़े अनुष्ठान धारण करता है — जन्माष्टमी पर कृष्ण का जन्म, गणेश चतुर्थी पर गणेश की स्थापना, और अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होने वाले दस दिन। इसका दूसरा, कृष्ण पक्ष पितृ पक्ष है, जो तर्पण और श्राद्ध द्वारा पूर्णतः पितरों को समर्पित है।

भाद्रपद शिवरात्रि 1944 कब है?

भाद्रपद शिवरात्रि 1944 — भाद्रपद मास की मासिक शिवरात्रि (कृष्ण चतुर्दशी) — उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में गुरुवार, 17 अगस्त 1944 को है। अमांत क्षेत्रों में यह शनिवार, 16 सितंबर 1944 को पड़ती है। इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक और रात्रि-पूजन का विशेष महत्व है।

भाद्रपद 1944 कब समाप्त होगा?

उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में भाद्रपद शनिवार, 2 सितंबर 1944 को श्रावण पूर्णिमा पर समाप्त होता है। अमांत क्षेत्रों में यह रविवार, 17 सितंबर 1944 को अमावस्या पर समाप्त होता है।

क्या सावन और श्रावण एक ही मास हैं?

हाँ। भाद्रपद मास इस चांद्र मास का संस्कृत नाम है और भाद्रपद उसी का प्रचलित हिन्दी रूप। दोनों एक ही अवधि बताते हैं — केवल नाम अलग है, तिथियाँ नहीं।

क्या भाद्रपद 1944 अधिक मास है?

नहीं। भाद्रपद 1944 एक सामान्य 29-दिवसीय मास है।