श्रावण मास · भगवान शिव

सावन 1938 आरंभ व समाप्ति तिथि (श्रावण मास)

उत्तर भारत (पूर्णिमांत): बुधवार, 13 जुलाई 1938गुरुवार, 11 अगस्त 1938

अमांत क्षेत्र: गुरुवार, 28 जुलाई 1938गुरुवार, 25 अगस्त 1938

शिव का सर्वाधिक पवित्र मास — सावन सोमवार व्रत, कांवड़ यात्रा और रुद्राभिषेक का मास।

सावन (श्रावण मास) में शिवलिंग के पास ध्यानमग्न भगवान शिव, पृष्ठभूमि में हिमालयी मंदिर पर बरसता सावन — वेदज्योतिक्स भक्ति-चित्र

सावन 2026 देखें — इस वर्ष

सावन 1938 एक नज़र में

उत्तर भारत · पूर्णिमांत
बुधवार, 13 जुलाई 1938
से गुरुवार, 11 अगस्त 1938 · 30 दिन
पूर्णिमा पर समाप्त होने वाला मास
अमांत क्षेत्र
गुरुवार, 28 जुलाई 1938
से गुरुवार, 25 अगस्त 1938 · 29 दिन
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु
उत्तर भारत · पूर्णिमांत
सावन सोमवार
4 · पहला सोम, 18 जुल॰
सावन शिवरात्रि
मंगल, 26 जुल॰
पूर्णिमा
गुरु, 11 अग॰
अमावस्या
बुध, 27 जुल॰
अमांत क्षेत्र
सावन सोमवार
4 · पहला सोम, 1 अग॰
सावन शिवरात्रि
बुध, 24 अग॰
पूर्णिमा
गुरु, 11 अग॰
अमावस्या
गुरु, 25 अग॰
तिथियाँ भिन्न क्यों? पूर्णिमांत पंचांग में मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है, अमांत में अमावस्या पर। इस कारण उत्तर भारत में सावन अमांत क्षेत्रों से लगभग 15 दिन पहले आरंभ होता है — यद्यपि पर्व एक ही दिन पड़ते हैं, क्योंकि वे तिथि पर आधारित हैं।

सावन का महत्व — भगवान शिव

श्रावण शिव का मास है। यह वर्षा के चरम पर पड़ता है, जब धरती हरी होती है और समुद्र-मंथन स्मरण किया जाता है — शिव ने सृष्टि की रक्षा हेतु इसी ऋतु में हलाहल विष पिया, और मास के जलार्पण उस जलते कंठ को शीतल करते हैं। प्रत्येक सोमवार सावन सोमवार व्रत रखा जाता है, और श्रद्धालु पैदल गंगाजल (कांवड़ यात्रा) लाकर लिंग पर चढ़ाते हैं।

सावन के अनुष्ठान

  • प्रत्येक सोमवार सावन सोमवार व्रत
  • शिवलिंग का रुद्राभिषेक और जलाभिषेक
  • कांवड़ यात्रा — पैदल गंगाजल लाना
  • बेल-पत्र, धतूरा और श्वेत पुष्प अर्पण
  • शिव चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ
  • मंगलवार को सुहागिनों का मंगला गौरी व्रत

सावन 1938 के प्रमुख दिन

व्रत और तिथियाँ उसी मास-अवधि से निकाली जाती हैं जिसका आप पंचांग मानते हैं — इसलिए दोनों पद्धतियाँ अलग-अलग दी गई हैं।

सावन 1938 के पर्व

पूर्णिमांत मास-अवधि (बुध, 13 जुल॰ – गुरु, 11 अग॰) के भीतर। पर्व तिथि से तय होते हैं, इसलिए दोनों पद्धतियों में एक ही दिन पड़ते हैं।

अमांत सावन में अतिरिक्त (गुरु, 28 जुल॰ – गुरु, 25 अग॰)

मासिक व्रत 1938

सावन की प्रमुख साधनाएँ

सावन सोमवार व्रत
मास के सोमवार, शिव को समर्पित। सावन की सबसे प्रसिद्ध साधना — इसी कारण यह मास दिनों से नहीं, सोमवारों से गिना जाता है।
मंगला गौरी व्रत
मास के मंगलवार, माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप हेतु। परंपरा में विवाहित स्त्रियाँ परिवार के कल्याण के लिए और अविवाहित कन्याएँ सुयोग्य वर की कामना से रखती हैं।
कांवड़ यात्रा
कांवड़िये पैदल चलकर गंगाजल लाते हैं — मुख्यतः हरिद्वार, गौमुख और सुल्तानगंज से — और सावन शिवरात्रि पर शिव मंदिर में अर्पित करते हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हरियाणा व दिल्ली में सर्वाधिक।
सावन शिवरात्रि
इस मास की मासिक शिवरात्रि, कृष्ण चतुर्दशी को। रात्रि जागरण और जलाभिषेक की परंपरा है, और अधिकांश कांवड़ जल इसी दिन चढ़ाया जाता है।
सावन व्रत विधि, उपवास नियम, जलाभिषेक और परंपराएँ — सम्पूर्ण मार्गदर्शिका पढ़ें

सावन 1938 — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्रावण मास 1938 कब से शुरू है?

उत्तर भारत (पूर्णिमांत पंचांग) में सावन बुधवार, 13 जुलाई 1938 से गुरुवार, 11 अगस्त 1938 तक रहता है। अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में यह गुरुवार, 28 जुलाई 1938 से गुरुवार, 25 अगस्त 1938 तक रहता है।

उत्तर और दक्षिण भारत में सावन की तिथियाँ अलग क्यों हैं?

क्योंकि दोनों भिन्न चंद्र पंचांग का पालन करते हैं। पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) में मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है, अतः यह अमांत की तुलना में लगभग 15 दिन पहले आरंभ होता है। अमांत पंचांग (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु) में मास अमावस्या से अमावस्या तक चलता है।

सावन 1938 किसे समर्पित है?

श्रावण शिव का मास है। यह वर्षा के चरम पर पड़ता है, जब धरती हरी होती है और समुद्र-मंथन स्मरण किया जाता है — शिव ने सृष्टि की रक्षा हेतु इसी ऋतु में हलाहल विष पिया, और मास के जलार्पण उस जलते कंठ को शीतल करते हैं। प्रत्येक सोमवार सावन सोमवार व्रत रखा जाता है, और श्रद्धालु पैदल गंगाजल (कांवड़ यात्रा) लाकर लिंग पर चढ़ाते हैं।

सावन शिवरात्रि 1938 कब है?

सावन शिवरात्रि 1938 — श्रावण मास की मासिक शिवरात्रि (कृष्ण चतुर्दशी) — उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में मंगलवार, 26 जुलाई 1938 को है। अमांत क्षेत्रों में यह बुधवार, 24 अगस्त 1938 को पड़ती है। इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक और रात्रि-पूजन का विशेष महत्व है।

1938 में सावन के कितने सोमवार हैं?

उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में 1938 के सावन में 4 सोमवार पड़ते हैं — सोमवार, 18 जुलाई 1938, सोमवार, 25 जुलाई 1938, सोमवार, 1 अगस्त 1938, सोमवार, 8 अगस्त 1938। अमांत क्षेत्रों में मास अलग तिथियों पर चलता है, इसलिए वहाँ 4 सोमवार होते हैं: सोमवार, 1 अगस्त 1938, सोमवार, 8 अगस्त 1938, सोमवार, 15 अगस्त 1938, सोमवार, 22 अगस्त 1938।

1938 का पहला सावन सोमवार कब है?

उत्तर भारत में पहला सावन सोमवार सोमवार, 18 जुलाई 1938 को है। अमांत पंचांग मानने वाले क्षेत्रों में पहला सोमवार सोमवार, 1 अगस्त 1938 को पड़ता है।

सावन 1938 कब समाप्त होगा?

उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में सावन गुरुवार, 11 अगस्त 1938 को श्रावण पूर्णिमा पर समाप्त होता है। अमांत क्षेत्रों में यह गुरुवार, 25 अगस्त 1938 को अमावस्या पर समाप्त होता है।

क्या सावन और श्रावण एक ही मास हैं?

हाँ। श्रावण मास इस चांद्र मास का संस्कृत नाम है और सावन उसी का प्रचलित हिन्दी रूप। दोनों एक ही अवधि बताते हैं — केवल नाम अलग है, तिथियाँ नहीं।

सावन सोमवार व्रत में क्या किया जाता है?

व्रत का संकल्प सोमवार की सुबह स्नान के बाद, पहली अर्घ्य से पहले लिया जाता है — बहुत लोग शिवलिंग या शिव के चित्र के सामने खड़े होकर बोलकर संकल्प करते हैं। सामान्यतः लिया जाता है — फल, दूध, दही, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, आलू, सेंधा नमक, मेवे और जल।

क्या सावन 1938 अधिक मास है?

नहीं। सावन 1938 एक सामान्य 30-दिवसीय मास है।