शरद पूर्णिमा 2026
अमृत बरसाने वाला चाँद — आश्विन पूर्णिमा को चाँदनी में खीर।
आज का पंचांग
काशी संदर्भ · तुरंत गणना- तिथि
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मुहूर्त और समय
काशी/IST · खगोलीय गणना- संकल्प (सूर्योदय)06:01
- सूर्यास्त17:22
- व्रत अवधि (तिथि)2026-10-25 · 12:01 → 09:48
- पारण (तिथि समाप्ति)09:48
शरद पूर्णिमा का महत्व
शरद पूर्णिमा, आश्विन की पूर्णिमा, वर्ष की वह एक रात्रि मानी जाती है जब चंद्रमा सोलहों कलाओं सहित उदित होता है — अंतिम अंश तक पूर्ण — और उसका प्रकाश अमृत धारण करता कहा जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा और, कृष्ण परंपरा में, महारास की रात्रि भी कहते हैं।
मुख्य विधि सरल है: खीर पकाकर रात भर खुले चंद्र के नीचे रखी जाती है, ताकि चंद्रप्रकाश उसमें बस जाए, और भोर में उपचारक प्रसाद रूप में खाई जाती है। वर्षा के पश्चात शरद का चंद्र वर्ष का सर्वाधिक स्वच्छ और शीतल है, और रात्रि उसके प्रकाश में जागकर बिताई जाती है।
कोजागरी — 'को जागर्ति' अर्थात कौन जाग रहा है — उस विश्वास को नाम देता है कि लक्ष्मी उस रात्रि संसार में यही पूछती फिरती हैं, और जिन घरों को जागृत पाती हैं उन्हें आशीष देती हैं। जागना ही पाया जाना है।
शरद पूर्णिमा पूजा विधि
- 1चंद्रोदय पर एक ऊँचा, खुला स्थान स्वच्छ कर चंद्र की ओर मुख कर पूजा सजाएँ।
- 2चावल, दूध और शर्करा की खीर पकाएँ; उसे चाँदी या स्वच्छ पात्र में सीधे चंद्रप्रकाश के नीचे रखें।
- 3चंद्र को अर्घ्य से पूजें, और लक्ष्मी को दीप, कमल तथा श्वेत मिष्ठान्न से।
- 4रात्रि भजन, लक्ष्मी स्तोत्र अथवा रास गीतों से जागकर बिताएँ; जागरण ही संकल्प है।
- 5खीर को रात भर चंद्रप्रकाश में रहने दें, केवल धूल से बचाकर।
- 6भोर में खीर देव को अर्पित कर प्रसाद रूप में लें; उसे बाँटें, विशेषतः अस्वस्थों के साथ।
मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalalaye Praseeda Praseeda
हे कमल पर विराजमान लक्ष्मी, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।
व्रत के नियम
- रात्रि चंद्रप्रकाश में जागकर बिताई जाती है, चंद्र और लक्ष्मी की आराधना में।
- खीर पकाकर रात भर खुले चंद्र के नीचे रखी जाती है, केवल पतले मलमल से ढकी, और भोर में खाई जाती है।
- अनेक दिन भर हल्का व्रत रखते हैं, जो चंद्र-स्पर्शित खीर से खुलता है।
- रात भर लक्ष्मी की पूजा होती है — कोजागरी जागरण उन्हीं के आशीष हेतु है।
- ब्रज में और कृष्ण भक्तों में रासलीला गाई और अभिनीत की जाती है।
सामान्य भूलें — किनसे बचें
- खीर को ढक्कन से ढकना — इसे चंद्र तले खुला छोड़ना चाहिए, केवल पतले मलमल से धूल से बचाकर।
- रात भर सोना; कोजागरी जागरण ही व्रत है — 'को जागर्ति', कौन जाग रहा है, यही मर्म है।
- खीर भीतर रखना; परंपरा यह है कि वह रात भर सीधे चंद्रप्रकाश में रहे।
- इसे केवल चंद्र-पर्व मानना और उस लक्ष्मी-पूजा को छोड़ना जिस पर पूर्वी कोजागरी केंद्रित है।
शरद पूर्णिमा की व्रत कथा
एक व्यापारी की दो पुत्रियाँ थीं जो दोनों पूर्णिमा व्रत रखतीं, पर बड़ी पूर्ण रखती और छोटी अधूरा छोड़ देती। छोटी की संतानें जन्म पर ही मर जातीं। निराशा में उसे कहा गया कि पूर्ण श्रद्धा से शरद पूर्णिमा जागरण रखे। उसने रखा — और जब उसका नवजात पुनः मृत-सा हुआ, उसने शिशु को लक्ष्मी के आसन पर लिटा उस वस्त्र से ढका जो पूजा में प्रयुक्त था। पवित्रीकृत वस्त्र का स्पर्श और जागृत रात्रि ने शिशु को जीवन लौटा दिया।
दूसरी, मधुर कथा में, यह वह रात्रि है जब कृष्ण ने यमुना तट पर बंसी बजाई और प्रत्येक गोपी अपने घर से निकल उनके संग रास रचाने आई — और कृष्ण ने स्वयं को अनेक कर प्रत्येक के संग ऐसे नृत्य किया मानो केवल उसी के संग, जिससे पूर्ण शरद-चंद्र ने एक ऐसे मंडल को देखा जिसका कोई छोर न था।
शरद पूर्णिमा — समय-रेखा
- चंद्रोदय
खुले, ऊँचे स्थान पर चंद्र की ओर मुख कर पूजा सजाई जाती है, जो इस रात्रि सोलहों कलाओं सहित उदित माना जाता है।
- खीर
चावल की खीर पकाकर सीधे चंद्रप्रकाश तले रखी जाती है, केवल पतले मलमल से ढकी, रात्रि का अमृत ग्रहण करने को।
- जागरण एवं लक्ष्मी पूजा
रात्रि भजन और लक्ष्मी-जागरण (कोजागरी) से जागकर बिताई जाती है — देवी जिन्हें जागृत पातीं उन्हें आशीष देती हैं।
- भोर — प्रसाद
चंद्र-स्पर्शित खीर प्रथम प्रकाश में अर्पित और ली जाती है, विशेषतः अस्वस्थों संग उपचारक प्रसाद रूप में बाँटी।
प्रसिद्ध स्थान एवं मंदिर
वृंदावन एवं ब्रज
महारास की रात्रि — बांके बिहारी और ब्रज-मंदिर रासलीला और चाँदनी कीर्तन रखते हैं, खीर खुले आकाश तले अर्पित।
बंगाल, ओडिशा एवं असम — कोजागरी लक्ष्मी
कोजागरी लक्ष्मी पूजा रूप में रखी, 'को जागर्ति' पूछती भाग्य-देवी हेतु रात्रि-जागरण।
द्वारका एवं गुजरात
पूर्ण चंद्र तले शरद पूर्णिमा रास और गरबा, खीर (दूध-पोहा) चंद्रप्रकाश हेतु रखी।
पुष्टिमार्ग हवेलियाँ (नाथद्वारा)
श्रीनाथजी और वल्लभ-मंदिर शरद-उत्सव रखते हैं, चाँदनी रात्रि हेतु देव श्वेत वस्त्रों में।
रोचक तथ्य
- ◆आश्विन की पूर्णिमा वह एकमात्र रात्रि मानी जाती है जब चंद्र सोलहों कलाओं सहित उदित होता है, प्रकाश अमृत धारण करता।
- ◆चंद्र-सिक्त खीर लोक-विश्वास में शरीर शीतल करती और भोर में ली जाने पर दमा जैसी दशाओं में सहायक मानी जाती है।
- ◆ब्रज परंपरा में यह महारास की रात्रि है, जब कृष्ण ने शरद-चंद्र तले प्रत्येक गोपी संग नृत्य किया।
- ◆'कोजागरी' 'को जागर्ति' से है — 'कौन जाग रहा है?' — वह प्रश्न जो लक्ष्मी रात्रि विचरण करते पूछती कही जातीं।
सामान्य प्रश्न
शरद पूर्णिमा को खीर चंद्र के नीचे क्यों रखी जाती है?
आश्विन की पूर्णिमा सोलहों कलाओं सहित उदित मानी जाती है और उसका प्रकाश अमृत धारण करता। उस प्रकाश में रात भर खुली रखी खीर उसे ग्रहण कर भोर में खाया जाने वाला उपचारक प्रसाद बन जाती है।
कोजागरी का अर्थ क्या है?
यह 'को जागर्ति' से है — 'कौन जाग रहा है?' माना जाता है कि लक्ष्मी उस रात्रि यही पूछती फिरती हैं, और जिन्हें जागृत पाती हैं उन्हें आशीष देती हैं। आराधना में जागना ही व्रत का मर्म है।
क्या शरद पूर्णिमा कृष्ण से जुड़ी है?
हाँ — ब्रज परंपरा में यह महारास की रात्रि है, जब कृष्ण ने शरद-चंद्र के नीचे गोपियों संग नृत्य किया। इसे चंद्र और लक्ष्मी पूजा के साथ रास गीतों से मनाया जाता है।
पर्व-दिन शास्त्रीय नियमों से निर्धारित हैं — उदया, प्रदोष, निशिता, मध्याह्न या अपराह्न व्यापिनी, जैसा प्रत्येक पर्व का विधान है — काशी/वाराणसी (IST) हेतु गणना। कुछ वर्षों में क्षेत्रीय पालन एक दिन आगे-पीछे हो सकता है।
2026 के अन्य प्रमुख पर्व
- मकर संक्रांति — 14 जनवरी 2026
- वसंत पंचमी — 23 जनवरी 2026
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- होलिका दहन — 3 मार्च 2026
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- चैत्र नवरात्रि प्रारंभ — 19 मार्च 2026
- राम नवमी — 26 मार्च 2026
- अक्षय तृतीया — 19 अप्रैल 2026
- जगन्नाथ रथ यात्रा — 16 जुलाई 2026
- गुरु पूर्णिमा — 29 जुलाई 2026
- नाग पंचमी — 17 अगस्त 2026
- रक्षा बंधन — 28 अगस्त 2026
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- हरतालिका तीज — 14 सितंबर 2026
- गणेश चतुर्थी — 14 सितंबर 2026
- अनंत चतुर्दशी — 25 सितंबर 2026
- पितृ पक्ष प्रारंभ — 27 सितंबर 2026
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- दशहरा / विजयादशमी — 20 अक्टूबर 2026
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- नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) — 8 नवंबर 2026
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