सावन 1934 आरंभ व समाप्ति तिथि (श्रावण मास)
उत्तर भारत (पूर्णिमांत): शुक्रवार, 27 जुलाई 1934 – शुक्रवार, 24 अगस्त 1934
अमांत क्षेत्र: शनिवार, 11 अगस्त 1934 – शनिवार, 8 सितंबर 1934
शिव का सर्वाधिक पवित्र मास — सावन सोमवार व्रत, कांवड़ यात्रा और रुद्राभिषेक का मास।

सावन 1934 एक नज़र में
- सावन सोमवार
- 4 · पहला सोम, 30 जुल॰
- सावन शिवरात्रि
- गुरु, 9 अग॰
- पूर्णिमा
- शुक्र, 24 अग॰
- अमावस्या
- शुक्र, 10 अग॰
- सावन सोमवार
- 4 · पहला सोम, 13 अग॰
- सावन शिवरात्रि
- शुक्र, 7 सित॰
- पूर्णिमा
- शुक्र, 24 अग॰
- अमावस्या
- शनि, 8 सित॰
सावन का महत्व — भगवान शिव
श्रावण शिव का मास है। यह वर्षा के चरम पर पड़ता है, जब धरती हरी होती है और समुद्र-मंथन स्मरण किया जाता है — शिव ने सृष्टि की रक्षा हेतु इसी ऋतु में हलाहल विष पिया, और मास के जलार्पण उस जलते कंठ को शीतल करते हैं। प्रत्येक सोमवार सावन सोमवार व्रत रखा जाता है, और श्रद्धालु पैदल गंगाजल (कांवड़ यात्रा) लाकर लिंग पर चढ़ाते हैं।
सावन के अनुष्ठान
- प्रत्येक सोमवार सावन सोमवार व्रत
- शिवलिंग का रुद्राभिषेक और जलाभिषेक
- कांवड़ यात्रा — पैदल गंगाजल लाना
- बेल-पत्र, धतूरा और श्वेत पुष्प अर्पण
- शिव चालीसा और महामृत्युंजय मंत्र का पाठ
- मंगलवार को सुहागिनों का मंगला गौरी व्रत
सावन 1934 के प्रमुख दिन
व्रत और तिथियाँ उसी मास-अवधि से निकाली जाती हैं जिसका आप पंचांग मानते हैं — इसलिए दोनों पद्धतियाँ अलग-अलग दी गई हैं।
उत्तर भारत · पूर्णिमांत
शुक्र, 27 जुल॰ – शुक्र, 24 अग॰ · 29 दिन
सावन सोमवार व्रत · 4
अमांत क्षेत्र
शनि, 11 अग॰ – शनि, 8 सित॰ · 29 दिन
सावन सोमवार व्रत · 4
सावन 1934 के पर्व
पूर्णिमांत मास-अवधि (शुक्र, 27 जुल॰ – शुक्र, 24 अग॰) के भीतर। पर्व तिथि से तय होते हैं, इसलिए दोनों पद्धतियों में एक ही दिन पड़ते हैं।
अमांत सावन में अतिरिक्त (शनि, 11 अग॰ – शनि, 8 सित॰)
मासिक व्रत 1934
सावन की प्रमुख साधनाएँ
- सावन सोमवार व्रत
- मास के सोमवार, शिव को समर्पित। सावन की सबसे प्रसिद्ध साधना — इसी कारण यह मास दिनों से नहीं, सोमवारों से गिना जाता है।
- मंगला गौरी व्रत
- मास के मंगलवार, माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप हेतु। परंपरा में विवाहित स्त्रियाँ परिवार के कल्याण के लिए और अविवाहित कन्याएँ सुयोग्य वर की कामना से रखती हैं।
- कांवड़ यात्रा
- कांवड़िये पैदल चलकर गंगाजल लाते हैं — मुख्यतः हरिद्वार, गौमुख और सुल्तानगंज से — और सावन शिवरात्रि पर शिव मंदिर में अर्पित करते हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हरियाणा व दिल्ली में सर्वाधिक।
- सावन शिवरात्रि
- इस मास की मासिक शिवरात्रि, कृष्ण चतुर्दशी को। रात्रि जागरण और जलाभिषेक की परंपरा है, और अधिकांश कांवड़ जल इसी दिन चढ़ाया जाता है।
सावन 1934 — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रावण मास 1934 कब से शुरू है?
उत्तर भारत (पूर्णिमांत पंचांग) में सावन शुक्रवार, 27 जुलाई 1934 से शुक्रवार, 24 अगस्त 1934 तक रहता है। अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में यह शनिवार, 11 अगस्त 1934 से शनिवार, 8 सितंबर 1934 तक रहता है।
उत्तर और दक्षिण भारत में सावन की तिथियाँ अलग क्यों हैं?
क्योंकि दोनों भिन्न चंद्र पंचांग का पालन करते हैं। पूर्णिमांत पंचांग (उत्तर भारत) में मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है, अतः यह अमांत की तुलना में लगभग 15 दिन पहले आरंभ होता है। अमांत पंचांग (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु) में मास अमावस्या से अमावस्या तक चलता है।
सावन 1934 किसे समर्पित है?
श्रावण शिव का मास है। यह वर्षा के चरम पर पड़ता है, जब धरती हरी होती है और समुद्र-मंथन स्मरण किया जाता है — शिव ने सृष्टि की रक्षा हेतु इसी ऋतु में हलाहल विष पिया, और मास के जलार्पण उस जलते कंठ को शीतल करते हैं। प्रत्येक सोमवार सावन सोमवार व्रत रखा जाता है, और श्रद्धालु पैदल गंगाजल (कांवड़ यात्रा) लाकर लिंग पर चढ़ाते हैं।
सावन शिवरात्रि 1934 कब है?
सावन शिवरात्रि 1934 — श्रावण मास की मासिक शिवरात्रि (कृष्ण चतुर्दशी) — उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में गुरुवार, 9 अगस्त 1934 को है। अमांत क्षेत्रों में यह शुक्रवार, 7 सितंबर 1934 को पड़ती है। इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक और रात्रि-पूजन का विशेष महत्व है।
1934 में सावन के कितने सोमवार हैं?
उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में 1934 के सावन में 4 सोमवार पड़ते हैं — सोमवार, 30 जुलाई 1934, सोमवार, 6 अगस्त 1934, सोमवार, 13 अगस्त 1934, सोमवार, 20 अगस्त 1934। अमांत क्षेत्रों में मास अलग तिथियों पर चलता है, इसलिए वहाँ 4 सोमवार होते हैं: सोमवार, 13 अगस्त 1934, सोमवार, 20 अगस्त 1934, सोमवार, 27 अगस्त 1934, सोमवार, 3 सितंबर 1934।
1934 का पहला सावन सोमवार कब है?
उत्तर भारत में पहला सावन सोमवार सोमवार, 30 जुलाई 1934 को है। अमांत पंचांग मानने वाले क्षेत्रों में पहला सोमवार सोमवार, 13 अगस्त 1934 को पड़ता है।
सावन 1934 कब समाप्त होगा?
उत्तर भारत (पूर्णिमांत) में सावन शुक्रवार, 24 अगस्त 1934 को श्रावण पूर्णिमा पर समाप्त होता है। अमांत क्षेत्रों में यह शनिवार, 8 सितंबर 1934 को अमावस्या पर समाप्त होता है।
क्या सावन और श्रावण एक ही मास हैं?
हाँ। श्रावण मास इस चांद्र मास का संस्कृत नाम है और सावन उसी का प्रचलित हिन्दी रूप। दोनों एक ही अवधि बताते हैं — केवल नाम अलग है, तिथियाँ नहीं।
सावन सोमवार व्रत में क्या किया जाता है?
व्रत का संकल्प सोमवार की सुबह स्नान के बाद, पहली अर्घ्य से पहले लिया जाता है — बहुत लोग शिवलिंग या शिव के चित्र के सामने खड़े होकर बोलकर संकल्प करते हैं। सामान्यतः लिया जाता है — फल, दूध, दही, साबूदाना, सिंघाड़े या कुट्टू का आटा, आलू, सेंधा नमक, मेवे और जल।
क्या सावन 1934 अधिक मास है?
नहीं। सावन 1934 एक सामान्य 29-दिवसीय मास है।