विवाह मुहूर्त क्यों महत्वपूर्ण है?
हिंदू परंपरा में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है — यह दो आत्माओं और दो परिवारों का पवित्र संगम है। सनातन धर्म में यह माना जाता है कि विवाह के समय का खगोलीय वातावरण दांपत्य जीवन की नींव को प्रभावित करता है।
शुभ मुहूर्त में विवाह करने से सुखमय, दीर्घस्थायी और समृद्ध दांपत्य जीवन की संभावना बढ़ती है।
शुभ विवाह मुहूर्त कैसे तय होता है?
विवाह मुहूर्त निर्धारण में निम्नलिखित तत्वों का विचार किया जाता है:
• शुभ तिथि: द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी • शुभ वार: सोमवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार • शुभ नक्षत्र: रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रेवती • लग्न: शुभ लग्न में शुभ ग्रह होना • गुरु और शुक्र का अस्त नहीं होना
2025 में प्रमुख विवाह मुहूर्त अप्रैल-जून और नवंबर-दिसंबर में हैं।
2025 में कौन से महीने विवाह के लिए अशुभ हैं?
2025 में जब गुरु (बृहस्पति) अस्त हों या खरमास (सूर्य धनु और मीन राशि में) हो तब विवाह नहीं होने चाहिए। इसके अलावा होलाष्टक (होली से 8 दिन पहले), पितृपक्ष (श्राद्ध पक्ष) और आषाढ़ से सावन (चातुर्मास) के दौरान भी विवाह वर्जित माने जाते हैं।
सटीक मुहूर्त के लिए अपने स्थानीय ज्योतिषी से और दोनों पक्षों की जन्म कुंडलियाँ दिखाकर परामर्श लें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या कोर्ट मैरिज के लिए भी मुहूर्त देखना चाहिए?
पारंपरिक दृष्टि से हाँ, लेकिन व्यावहारिक रूप से न्यायालय विवाह में यह हमेशा संभव नहीं होता। धार्मिक अनुष्ठान के लिए शुभ मुहूर्त अलग से रख सकते हैं।
मुहूर्त और कुंडली मिलान में पहले क्या होता है?
पहले कुंडली मिलान होता है ताकि संगतता सुनिश्चित हो सके। उसके बाद शुभ मुहूर्त का चुनाव किया जाता है।